पैग़म्बर इब्राहिम (अस.) के जीवन से सबक़

पैग़म्बर इब्राहिम, या अब्राहम (अस.) जैसा कि उन्हें आमतौर पर कहा जाता है, इस्लाम के सबसे महान पैग़म्बरों में शुमार हैं। उनके जीवन की कहानी निश्चित रूप से ऐसी है जो हमारी धार्मिक प्रथाओं की वैधता पर सवाल उठाती है और हमें धर्म को एक अलग दृष्टिकोण से देखने के लिए मजबूर करती है।

पैग़म्बर इब्राहिम (अस.) का जीवन उन घटनाओं से भरा हुआ था जो तर्क और आध्यात्मिक पक्ष का एक साथ एकजुट होने की उनकी इच्छा को दर्शाता है।

पैग़म्बर इब्राहिम (अस.) बहुदेववादियों के एक समुदाय में रहते थें जो मूर्तियों की पूजा करते थें। वास्तव में, उनके पिता भी एक प्रसिद्ध मूर्तिपूजक थें। अपने पिता को मूर्तियों का निर्माण और पूजा करते हुए देखकर, पैग़म्बर इब्राहिम (अस.), बहुत छोटी उम्र से समझ नहीं पाए कि लोग इन निर्जीव वस्तुओं को अपने भगवान के रूप में कैसे मान सकते हैं! लोग उन बेजान संरचनाओं को भोजन देतें और उनसे क्षमा मांगते!

पैग़म्बर इब्राहिम (अस.) ने कई बार ऐसी प्रथाओं और रीति-रिवाजों का विरोध किया, हर बार उन्हें अपने साथियों से फटकार और अपने पिता से क्रोध प्राप्त हुआ। फिर भी, पैग़म्बर इब्राहिम (अस.) ने ज़ोर देकर कहा कि मूर्ति पूजा जैसी रूढ़िवादी प्रथाओं का कोई फ़ायदा नहीं है, और मनुष्यों को बेजान वस्तुओं के सामने झुकने की ज़रूरत नहीं है।

इस प्रकार, पैग़म्बर इब्राहिम (अस.) का जीवन हमें जो सही लगता है उसके साथ खड़े होने के लिए प्रेरित करता है। ना केवल उन्होंने अपने साथियों की अतार्किक प्रथाओं पर सवाल उठाया, ब्लकि उन्होंने सक्रिय रूप से अपने लोगों को सही रास्ते की ओर मार्गदर्शन करने का प्रयास किया क्योंकि वो जानते थे कि वह तर्कपूर्ण हैं और सबसे बढ़कर, जब लोगों से उन्हें घृणा और तिरस्कार का सामना करना पड़ा, तो उन्होंने सत्य में कभी भी विश्वास नहीं खोया।

ग्रेट फ़ायर घटना में इसे बहुत ख़ूबसूरती से चित्रित किया गया था। पैग़म्बर इब्राहिम (अस.) ने लोगों को यह दिखाने के लिए मंदिर में मूर्तियों का सिर काट दिया कि जिन मूर्तियों से वे डरते थे और उनकी पूजा करते थे, वे ख़ुद के लिए भी सक्षम नहीं थीं। लेकिन निश्चित रूप से, जो चीज़ें हम पैत्रिक रूप से सीखते हैं, वह आसानी से नहीं बदल सकतीं, इसलिए हर कोई अपने “देवताओं” का अपमान करने के लिए इब्राहिम (अस.) के खिलाफ़ हो गया। और इस तरह इब्राहिम (अस.) को जलाने का फैसला किया गया। उन्होंने इतनी बड़ी आग लगा दी कि उसके पास जाना भी मुश्किल था, और इब्राहीम (अस.) को ज़ंजीरों से जकड़ कर आग में झोंक दिया। लेकिन थोड़ी देर बाद, उन्होंने देखा कि आग ने इब्राहिम (अस.) को कोई नुक़सान नहीं पहुँचाया वास्तव में इसने उनके बंधनों को नष्ट कर दिया था और उन्होंने एक व्यक्ति को देखा, जो इब्राहिम (अस.) के समान था, जो उनके साथ आग में बैठा था। वह उन्हें बचाने के लिए अल्लाह का भेजा हुआ फ़रिश्ता था।

क्या यह घटना हमें यह बताने का एक अद्भुत उदाहरण नहीं है कि अल्लाह हमेशा हमारे साथ है? अगर हम धर्मी हैं और सच्चाई के लिए खड़े हैं, तो अल्लाह हमारे साथ खड़ा रहेगा।

एक अन्य समय में, एक बहुत शक्तिशाली राजा, जो ख़ुद को इश्वर मानता था, उसने पैग़म्बर इब्राहिम (अस.) को उसे ग़लत साबित करने के लिए चुनौती दी। पैग़म्बर इब्राहिम (अस.) ने उनसे बहुत शांति से पूछा कि क्या वह सूर्य को पश्चिम से उदय कर सकते हैं। सरल … और इसी तरह, इब्राहिम (अस.) ने अपनी बात साबित कर दी कि यह विशेष राजा हममें से बाकी लोगों की तरह एक नश्वर इंसान से ज़्यादा कुछ नहीं था।

ये दोनों घटनाएं पैग़म्बर इब्राहिम (अस.) के भरोसे और विश्वास को उजागर करती हैं। वह जानते थें कि उनके विश्वास तर्क द्वारा समर्थित थें, और इसलिए उन्हें डरने की कोई बात नहीं थी।

अंत में, सबसे महत्वपूर्ण सबक़ जो हम पैग़म्बर इब्राहिम (अस.) से सीख सकते हैं, वह है क्षमा। जी हां, उन्होंने अपने लोगों के रहन-सहन पर सवाल उठाए। हां, उन्हें अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध जाना पड़ा क्योंकि उनके पिता बार-बार उनकी बात समझने से इनकार करते थें। हां, वह जिस चीज़ में विश्वास करते थें, उसके लिए उनके साथियों ने उन्हें आग में झोंक दिया था। लेकिन उन्होंने क्षमा के अपने गुण से कभी समझौता नहीं किया। इब्राहिम (अस.) जानते थें कि दूसरों के प्रति द्वेष रखना सही तरीका नहीं है। और इस प्रकार, उन्होंने बार-बार अपने लोगों की मदद करने की कोशिश की, भले ही वे परंपरा और कलंक से अंधे थें। बेशक, सदियों बाद हमारे पैग़म्बर मुहम्मद (ﷺ) भी ऐसा ही करेंगे।

जैसे कि हम ईद-उल-अज़हा के निकट आ रहें हैं, एक ऐसा वाकया जो पैग़म्बर इब्राहिम (अस.) की अल्लाह के लिए सबसे बड़ी कुर्बानी देने की इच्छा को याद करता है, यह समय है कि हम अपने जीवन पर पुनर्विचार करें। ईद-उल-अज़हा के उत्सव के बीच, आइए हम ख़ुद को उन सभी चीज़ों की याद दिलाएं जिनके लिए पैग़म्बर इब्राहिम (अस.) खड़े थे, और उन सबक़ पर विचार करें जो हम उनके जीवन से सीख सकते हैं।